हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया रहमतुल्लाहि तआला अलैह और हज़रत अमीर ख़ुसरो का बहुत ही दिलचस्प वाकिया

Published on January 25, 2019

हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया रहमतुल्लाहि तआला अलैह और                   हज़रत अमीर ख़ुसरो का बहुत ही दिलचस्प वाकिया

 

 

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एक दिन एक सैय्यद ज़ादा हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया रहमतुल्लाहि तआला अलैह की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया !*
*”हज़रत में एक ग़रीब सैय्यद ज़ादा हूँ और सिर पर जवान बेटियों का बोझ है, सादात घराने की निस्बत होने की वजह से ज़कात भी नहीं ले सकता आप मेरे दीनी भाई हैं, और सैयद भी तो आप मेरी कुछ मदद करें…।”*

*आप ने उनको इज़्ज़त के साथ बिठाया और अपने ख़ादिम से पूछा कि आज कोई नज़र-ओ-नियाज़ आई खानकाह में??*
*ख़ादिम ने अर्ज़ किया “अभी तक तो कोई नहीं आया है, लेकिन जैसे ही कोई आए तो इत्तला कर दूंगा..।।”*

*आपने सैय्यद ज़ादे को तसल्ली दी और कहा “अल्लाह पे भरोसा रखिये वह ग़ैब से कोई न कोई इंतज़ाम ज़रूर कर देगा,,,*
*मगर तीन दिन बीत गए कोई नियाज़ न आई..*
*सैय्यद ज़ादा भी मायूस हो गया कि यहाँ तो कोई मदद नहीं हो सकी मेरी,,,*
*एक दिन उसने वापसी की इजाज़त मांगी..।।*

*हज़रत मेहबूब्-ए-इलाही रहमतुल्लाहि तआला अलैह को बहुत दुख हुआ कि मेहमान खाली हाथ घर से जा रहा है… आपने उसे कुछ पल के लिये रोका, और अंदर से अपने जूते लाकर दे दिए और कहा भाई इस फ़कीर के पास तुम्हें देने के लिए अपने इन जूतों के अलावा कुछ नहीं…।।*
*वह सैय्यद ज़ादा जूते लेकर चल पड़ा और सोचने लगा कि उनके पुराने सड़े जूतों का क्या करूंगा हज़रत ने अच्छा मजाक किया मेरे साथ..।।*

*वहीं दूसरी तरफ़ सुल्तान मुहम्मद तुग़लक किसी जंग से वापस आ रहे थे और हज़रत अमीर ख़ुसरो (जो हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया रहमतुल्लाहि तआला अलैह के खलीफा भी हैं)* *सुल्तान के साथ थे और चूंकि आप एक क़ाबिल शायर थे इसलिए दरबारे सुल्तानी में आपको अहमियत हाँसिल थी..।।*
*आपने सुल्तान की शान में क़सीदा कहा, तो सुल्तान ने ख़ुश होकर आप को सात लाख चीतल (सिक्का ए रियाज़ुल वक़्त) से नवाज़ा..।।*
*वापसी सफ़र पर जब अभी लश्कर-ए- सुल्तानी दिल्ली से बाहर ही था,,* *और रात में पड़ाव किया गया तो अचानक अमीर ख़ुसरो चिल्ला उठे “मुझे अपने मुर्शिद की खुशबू आती है..”*
*मसाहिब बोले अमीर ख़ुसरो ! “हज़रत महबूब-ए-इलाही तो किलो खड़ीय में हैं, जो दिल्ली से काफी दूर है, तो आप को उनकी खुशबू कैसे आ गई ?*

*लेकिन अमीर ख़ुसरो बेकरार होकर बाहर निकल पड़े और ख़ुशबू का पीछा करते करते एक सराय तक जा पहुंचे ।।*
*जहाँ एक कमरे में एक आदमी अपने सिर के नीचे कुछ रखकर सोया हुआ था, और खुशबू वहीं से आ रही थी..।।*
*आप ने उसे जगाया और पूछा ! “तुम हज़रत निज़ामउद्दीन की ख़ानकाह से आ रहे हो क्या??*
*तो वह आँखें मलता हुआ बोला हाँ*

*आपने बे-सब्री से पूछा कैसे हैं मेरे मुर्शिद ?*
*वह आदमी बोला, वह तो ठीक हैं।। मैं उनके पास मदद के लिए गया था, लेकिन और कुछ तो दिया नहीं, हाँ अपने पुराने सड़े जूते जरूर दिए हैं।।*

*यह सुनते ही अमीर ख़ुसरो की हालत ख़राब हो गई और कहने लगे कहाँ हैं मेरे मुर्शिद के जूते ?*
*तो उसने एक कपड़ा खोल कर दिखाए..*
*आपने अपने मुर्शिद के जूतों को चूमा और अपनी आंखों से लगाया और कहने लगे, क्या तू इन्हें बेचेगा?*
*उसने कहा अमीर क्यों मज़ाक उड़ाते हो??*
*अमीर ख़ुसरो बोले मज़ाक नहीं..मेरे पास इस समय सात लाख चीतल हैं, इन्हें ले लो मगर मेरे मुर्शिद के जूते मुझे दे दो,,, और अगर चाहो तो दिल्ली चलो में तुम्हे इतनी ही रक़म और दूंगा ।।*
*सात लाख चीतल का सुनकर वह चकरा गया, और बोला नहीं बस मेरा तो कुछ हज़ार से गुज़ारा हो जाएगा,,, मगर अमीर ख़ुसरो ने जबरन उसे सात लाख चीतल दिए और साथ में लिख कर भी दे दिया ताकि कोई शक न करे।।*

*और फिर अमीर ख़ुसरो इस हालत में खानकाहे मुर्शिद में हाज़िर हुए,, जूते अपनी दस्तार में लपेट रखे थे और सिर पर रखे बढ़े चले आ रहे थे, और ज़ारो क़्तार रो रहे थे…*

*हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने मुस्कुराते हुए पूछा ख़ुसरो ! “हमारे लिये क्या लाए हो” ?*
*अमीर ख़ुसरो ने कहा सैय्यदी आपके जूते लाया हूँ ।।*
*हज़रत निज़ामउद्दीन औलिया ने सवाल किया “कितने में खरीदा”?*
*अमीर ख़ुसरो ने जवाब दिया ” हुज़ूर सात लाख चीतल में”*
*मेहबूब-ए-इलाही मुस्कुराते हुए बोले “बहुत महंगा लाए हो”*
*अमीर ख़ुसरो ने कहा “या सैय्यदी सात लाख चीतल तो बहुत कम हैं,,अगर वो सैय्यद ज़ादा मेरी जान भी माँगता तो अपनी जान देकर भी आपके जूते हाँसिल कर लेता ।।*

*यह थी उनकी अपने मुर्शिद से मुहब्बत ।।*

*📚अल्लाह के सफ़ीर📚*

*🌹पीरों में पीर गौस-ए-पाक़🌹*
*🌹मुरीदों में मुरीद ख़ुसरो पाक़🌹*
*( रदिअल्लाहु तआला अन्हुमा )*

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